पुरानी ‘मदर इंडिया’ और आज की फिल्मों में क्या बदल गया? क्यों आज नहीं बनतीं वैसी फ़िल्में।

भारतीय सिनेमा के इतिहास में कुछ फिल्में ऐसी होती हैं जो सिर्फ पर्दे पर नहीं चलतीं, बल्कि समाज की रूह में बस जाती हैं। 1957 में आई महबूब खान की ‘मदर इंडिया’ महज एक फिल्म नहीं थी, वह आजाद भारत की उन चुनौतियों, संघर्षों और मूल्यों का दस्तावेज थी, जिसने देश को एक नई पहचान दी। लेकिन आज जब हम 2026 के सिनेमाई परिदृश्य को देखते हैं, तो एक बड़ा सवाल खड़ा होता है— क्या आज के दौर में वैसी फिल्में बनना मुमकिन है? आखिर वह क्या वजहें हैं जिन्होंने हिंदी सिनेमा की कहानी कहने के ढंग को पूरी तरह बदल दिया है?


Quick Highlights: सिनेमा का बदलाव एक नज़र में

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मुख्य बिंदु‘मदर इंडिया’ का दौर (1950-60)आज का आधुनिक सिनेमा (2020+)
मुख्य विषय (Theme)सामाजिक संघर्ष, किसानी, त्याग और नैतिकताव्यक्तिगत महत्वाकांक्षा, अर्बन लाइफस्टाइल, थ्रिलर
नायक की परिभाषाआदर्शवादी, समाज के लिए बलिदान देने वालाग्रे-शेड्स (Anti-hero), खुद के लिए लड़ने वाला
निर्माण की प्राथमिकताकहानी की गहराई और भावनाओं पर जोरवीएफएक्स (VFX), मार्केटिंग और ओपनिंग कलेक्शन
दर्शकों का जुड़ावसामुदायिक अनुभव (Mass connection)व्यक्तिगत और डिजिटल अनुभव (OTT/Multiplex)
महिला किरदारशक्ति और सहनशीलता का प्रतीक (राधा)ग्लैमर या एक्शन-ओरिएंटेड भूमिकाएं

मिट्टी की खुशबू बनाम तकनीक की चमक

‘मदर इंडिया’ की सफलता का सबसे बड़ा कारण उसकी मिट्टी से जुड़ी कहानी थी। उस समय भारत एक कृषि प्रधान देश के रूप में खुद को गढ़ रहा था। फिल्म में नरगिस का किरदार ‘राधा’ भारत माता का रूप था, जो गरीबी और सामंतवाद (Feudalism) के खिलाफ लड़ रही थी। आज के सिनेमा में मिट्टी की वह सोंधी खुशबू कम होती जा रही है।

आज की फिल्में अक्सर ‘ग्लोबल’ दिखने की होड़ में अपनी जड़ें भूल जाती हैं। अब कहानियाँ खेतों और गांवों से निकलकर बड़े शहरों के आलीशान फ्लैट्स या विदेशों की लोकेशंस तक सिमट गई हैं। तकनीक और वीएफएक्स ने दृश्य तो भव्य बना दिए हैं, लेकिन उन दृश्यों के पीछे छिपी मानवीय संवेदनाएं कहीं खो गई हैं। महबूब खान ने बिना किसी आधुनिक तकनीक के जो प्रभाव पैदा किया था, वह आज करोड़ों रुपये खर्च करने के बाद भी नहीं मिल पाता।

नायक और खलनायक का बदलता व्याकरण

पुराने दौर की फिल्मों में नायक एक आदर्श होता था। वह समाज के गलत तत्वों के खिलाफ खड़ा होता था और अंत में नैतिकता की जीत होती थी। ‘मदर इंडिया’ में जब राधा अपने ही बेटे बिरजू को मार देती है क्योंकि वह कानून तोड़ रहा था, तो वह नैतिकता के उच्चतम स्तर को दर्शाता है।

आज के सिनेमा में ‘हीरो’ की परिभाषा बदल चुकी है। अब दर्शक ऐसे किरदारों को पसंद करते हैं जो पूरी तरह सही नहीं हैं। ‘ग्रे शेड्स’ वाले किरदार आज की पसंद हैं। नैतिकता अब धुंधली हो चुकी है। आज का हीरो व्यवस्था को बदलने के बजाय, व्यवस्था का फायदा उठाकर अपनी जीत पक्की करना चाहता है। यही कारण है कि ‘बिरजू’ जैसा विद्रोही किरदार आज की फिल्मों में अक्सर ‘प्रोटागोनिस्ट’ बन जाता है, जबकि उस दौर में वह एक भटका हुआ बेटा था।

क्यों अब मुमकिन नहीं ‘मदर इंडिया’ जैसी फिल्में?

इस बदलाव के पीछे कई गहरे सामाजिक और आर्थिक कारण हैं, जिन्हें समझना जरूरी है:

  • व्यावसायिक दबाव (Commercial Pressure): आज एक फिल्म पर 200 से 500 करोड़ रुपये दांव पर लगे होते हैं। फिल्म निर्माता कोई जोखिम नहीं लेना चाहते। वे एक ऐसे ‘फॉर्मूले’ पर काम करते हैं जो पहले वीकेंड में ही पैसा वसूल कर ले। ‘मदर इंडिया’ जैसी फिल्में समय मांगती हैं, वे धीरे-धीरे दर्शकों के दिलों में उतरती हैं, लेकिन आज के दौर में इतना सब्र किसी के पास नहीं है।
  • दर्शकों की पसंद में बदलाव: आज का युवा दर्शक ‘Escapism’ (पलायनवाद) तलाशता है। उसे अपनी रोजमर्रा की समस्याओं से दूर एक अलग दुनिया देखनी है। गरीबी और संघर्ष की कहानियाँ अब ‘डिप्रेसिंग’ मानी जाने लगी हैं, जबकि पुराने दौर में यही संघर्ष लोगों को एक-दूसरे से जोड़ता था।
  • लेखन का संकट: पहले के लेखक समाज की नब्ज पहचानते थे। उनके पास साहित्य और जीवन का गहरा अनुभव होता था। आज की स्क्रिप्ट्स अक्सर विदेशी फिल्मों से प्रेरित होती हैं या फिर ‘ट्रेंड्स’ को देखकर लिखी जाती हैं। मौलिकता की कमी ने सिनेमा के स्तर को प्रभावित किया है।

महिला किरदारों का संकुचित दायरा

‘मदर इंडिया’ में नरगिस ने जो भूमिका निभाई, वह भारतीय सिनेमा की सबसे ताकतवर महिला भूमिका मानी जाती है। वह सिर्फ एक माँ नहीं थी, वह साहस और स्वाभिमान का प्रतीक थी। आज महिला प्रधान फिल्में (Female-led films) तो बन रही हैं, लेकिन उनका दायरा अक्सर ‘बदला’ लेने या ‘ग्लैमर’ तक सीमित रहता है। राधा जैसा किरदार जो पूरे समाज की जिम्मेदारी अपने कंधों पर उठाए, वैसा लेखन आज देखने को नहीं मिलता।


सुरेंद्र का नज़रिया: विश्लेषण और भविष्य की राह

सिनेमा समाज का आईना होता है, और अगर आज ‘मदर इंडिया’ नहीं बन रही है, तो इसका मतलब है कि हमारा समाज बदल गया है। मेरी राय में, आज के फिल्म मेकर्स ‘इमोशनल कनेक्टिविटी’ पर ‘विजुअल स्पेक्टेकल’ को तरजीह दे रहे हैं।

डेटा बताता है कि पिछले कुछ वर्षों में भारत में साउथ की उन फिल्मों ने ज्यादा कमाई की है जिनमें मिट्टी से जुड़ाव और जड़ों की बात की गई है (जैसे ‘कांतारा’ या ‘पुष्पा’)। यह इस बात का संकेत है कि हिंदी सिनेमा के दर्शक आज भी वही जज्बात चाहते हैं, लेकिन हम उन्हें पश्चिमी ढर्रे पर बनी कहानियाँ परोस रहे हैं।

‘मदर इंडिया’ का दौर वापस नहीं आ सकता क्योंकि वह एक खास कालखंड की उपज थी। लेकिन, उस फिल्म से जो सीख ली जा सकती है, वह है ‘कहानी की ईमानदारी’। अगर आज के फिल्म निर्माता केवल ग्लैमर और कलेक्शन के बजाय किरदारों की गहराई पर काम करें, तो हम फिर से ऐसे क्लासिक्स देख सकते हैं जो दशकों तक याद रखे जाएंगे। फिलहाल, हम एक ऐसे संक्रमण काल में हैं जहाँ तकनीक हावी है और संवेदनाएं हाशिए पर हैं। जिस दिन यह संतुलन फिर से बनेगा, भारतीय सिनेमा अपनी असली पहचान वापस पा लेगा।

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